India

agriculture india : पूर्वोत्तर ने कृषि क्षेत्र में वो कर दिखाया जो 6 साल पहले संभव न था

पूर्वोत्तर का कृषि निर्यात फला-फूला ...त्रिपुरा का कटहल, असम का अंगूर जा रहा विदेश

SOURABH SONI ( Editor)

agriculture india : वर्तमान में जैविक खेती की बात की जाये तो देश भर में इसके लिये योजनाओं के माध्यम से युद्ध स्तर पर प्रयास किया जा रहा है परंतु बात की जाये वर्तमान में हमारे देश के पूर्वोत्तर की तो यहॉ पर जो प्रयास हो रहे हैं वह सराहनीय है। जब बात कृषि संपदा की होती है तो सबसे पहले दिमाग में यह बात आती है कि कृषि उत्पादों में रसायनिक खेती अथवा जैविक खेती किस पद्धति से खेती की जा रही है। रासायनिक खेती का उपयोग कम से कम हो इसीलिये हमें जैविक खेती की ओर देखना होगा। इसीलिये जैविक कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने की अपनी रणनीति बनाई जा रही है।

आज इस लेख में हम बात करेंगे कि कैसे पूर्वोत्तर (indian manufacturing ) ने किसानों को रासायनिक के बदले जैविक खेती करने के तरीके से गुणवत्तापूर्वक फसल का उत्पादन किया है अपितु निर्यात के मामले में भी लंदन और बांग्लादेश जैसे देशों में हटकोरा यानी साइट्रस फल की एक किस्म की खेप पहुंचाई है।

पूर्वात्तर में बढ़ रहा कृषि उत्पादों का निर्यात

agriculture news – पूर्वोत्तर की सफलता है उत्पादों जैसे किवी वाइन, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, जोहा चावल पुलाव, काला राइस खीर आदि के गीले नमूने लेने के लिए ब्रांडिंग और प्रचार करने के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र को अपना समर्थन दिया। देखने में आया है कि पूर्वोत्तर ने अपने प्रभावशाली तकनीक से मिजोरम के ममित जिले के किसानों से मंगाई गई हटकोरा (साइट्रस की स्थानीय किस्म) की एक खेप लंदन को निर्यात की गई और हटकोरा की एक और खेप बांग्लादेश को निर्यात की जा रही है। अभी तक बांग्लादेश, भूटान, मध्य पूर्व, ब्रिटेन और यूरोप उत्पादों के निर्यात में शामिल हो चुके हैं।

बात की जाये पूूर्वोत्तर क्षेत्र के कृषि उत्पादन की तो यहॉ पर आपको हैरानी होगी की 6 वर्षों में कृषि उत्पादों के निर्यात में 85.34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है; इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 6 साल में नया परिवर्तन लाने से ही यह संभव हुआ होगा। बात 2016-17 की करें तो यहॉ निर्यात 2.52 मिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2021-22 में 17.2 मिलियन अमरीकी डॉलर हो गया था।

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north east news – सिक्किम, असम ( assam farmer), नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों से कृषि उपज के निर्यात में जबरदस्त वृद्धि हुई है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में पिछले छह वर्षों में कृषि उत्पादों के निर्यात में 85.34 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो वर्ष 2016-17 में 2.52 मिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2021-22 में 17.2 मिलियन अमरीकी डॉलर हो गया।

मिजोरम की इन फसलों का निर्यात

मिजोरम से निर्यात के लिए संभावित फ सलों में अनानास, ( mizoram ananas) हटकोरा (साइट्रस), ड्रैगन फ्रूट, संतरा, पैशन फ्रूट, स्क्वैश, एंथुरियम फूल, मिजो अदरक, मिजो मिर्च और अंगूर वाइन हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र के 8 राज्यों में दौरा भारत सरकार के आमंत्रण पर पड़ोसी देशों, मध्य पूर्व, सुदूर पूर्वी देशों, यूरोपीय देशों और ऑस्ट्रेलिया आदि से आयातकों ने किया था। विदेशी मेहमानों ने पूर्वोत्तर के किसानों द्वारा अपनाई जा रही गुणात्मक खेती प्रथाओं के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी प्रदान की जिससे उनको लाभ मिले।

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पूर्वोत्तर क्षेत्र और अन्य राज्यों के निर्यातकों के साथ श्रीलंका, दुबई, बांग्लादेश, ओमान, नीदरलैंड, सिंगापुर और ग्रीस के आयातकों ने भाग लिया इसके लिये अंतरराष्ट्रीय क्रेता-विक्रेता मीट (बीएसएम) का आयोजन किया गया जिसमें राज्य भर के प्रदर्शकों ने कृषि-बागवानी उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की, जिसमें जीआई उत्पाद जैसे ताजे फल, सब्जियां, प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद, काला चावल, लाल चावल, जोहा चावल, मसाले, चाय, कॉफ ी, शहद, प्रसंस्कृत मांस, मसाले और जैविक उत्पाद शामिल थे।

त्रिपुरा का कटहल, असम का अंगूर जा रहा विदेश

त्रिपुरा (tripura) का कटहल (kathal) , (nagalend) नागालैंड का मिर्च, असम का बर्मी अंगूर आज निर्यात किया जा रहा है। बात त्रिपुरा के कटहल की करें तो यह लंदन और राजा मिर्च नागालैंड (raja mircha) में उत्पादित है जिसे का लंदन को निर्यात किया गया। इसके अलावा, असम (assam news) के स्थानीय फल लेटेकू (बर्मी अंगूर) (Burmese grapes ) को दुबई को निर्यात किया जाता था। इसके अलावा असम के पान के पत्ते (Assam Latest News) नियमित रूप से लंदन को निर्यात किए जाते रहे हैं। यह कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से संभव हुआ है।

इस लेख में हमें यह बात जानने मिली है कि रिकार्ड आंकड़ों के अनुसार पूर्वोत्तर ने 6 सालों में कृषि निर्यात को बढ़ाया है उसके पीछे की वजह है उत्पादन तकनीक और किसानों की तकनीक देने का काम युद्ध स्तर पर हुआ है। जो 6 साल पहले संभव नहीं था।
north east farmer – अंत में यह बात मानना जरूरी है कि तकनीक और जानकारी मिलने के साथ-साथ किसानों की अथक मेहनत भी फसलों उत्पादन के लिये आवश्यक है। इसीलिये हम कह रहे हैं कि जय जवान जय किसान और जय विज्ञान (jay jawan jay kisaan jay vigyan ) यह आज का वाक्यांश है क्योंकि देश के जवान और किसान (indian farmer ) साथ में विज्ञान यानी तकनीक का उपयोग करना लाभकारी देशहित में होता है।

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