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Anti Terror Conference : आतंकवाद के मुद्दे पर सभी देश अपना हित त्याग कर एक क्यों नहीं हो जाते? 

anti terror conference : वर्तमान दशक में कई देश आमने-सामने से लड़ चुके हैं, लड़ रहे हैं तो कुछ देश परदे के पीछे से,तो कुछ  लड़ने के लिए देशों को उकसा रहे हैं और आपस में लड़वा रहे हैं। लड़ने-लड़ाने की मंशा के पीछे कुछ  देशों के शातिर दिमाग में अधिकार क्षेत्र का विस्तार है ,कुछ देशों के मन में भूभाग  विस्तार है,कुछ देशों के मन में समुद्री क्षेत्र का विस्तार है, कुछ देशों के मन में संसाधनों का विस्तार है, तो कुछ देशों के मन में हथियारों की बिक्री, तो कुछ के मन में लड़ाई करने वाले देशों को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से कमजोर करना।

इस परिदृश्य को देखते हुए जहां कुछ देश मानव और प्रकृति विनाश के हथियारों का जखीरा बढ़ा रहे हैं, वहीं कुछ देश अपने ऊपर आक्रमण के भय से ताकतवर देशों से हथियार खरीदने के लिए मजबूर हैं।जो देश ना तो हथियार बना सकते हैं और ना ही खरीदने की स्थिति में है वे शक्तिशाली देशों या देशों के समूह की शरण में हैं।

कैसा समय आ गया है जहां विभिन्न विकसित, शक्तिशाली, संसाधन सम्पन्न देशों को अविकसित और विकासशील देशों की मदद करना चाहिए, उन्हें गरीबी, पेयजल, भूखमरी और स्वास्थ्य जैसी समास्याओं से उबारना चाहिए, उनका सारा ध्यान विध्वंसक हथियारों की सप्लाई में लगा हुआ है।विश्व शांति की दिशा में किसी भी देश को चिंता और  दिलचस्पी नहीं,यहां तक की यूएन को भी नहीं। भारत ही एक ऐसा देश है जो अपने वैदिक ज्ञान और सनातन संस्कृति के कारण वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है, पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक शांति के लिए प्रार्थना करता है।

मुझे ऐसा लगता है आज अधिकांश देश स्वार्थी हो चले हैं,हर घटना,विषयवस्तु और परिस्थितियों में कुशल व्यापारी की तरह नफा और नुकसान को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते हैं और संबंधों को स्थापित करते हैं।इसीलिए शायद  विभिन्न देशों के मध्य चल रहे घोषित और अघोषित युद्ध को समाप्त करने के प्रयास न के ही बराबर दिखाई देते हैं। दिखाई दें भी कैसे विश्व शांति में उन्हें अपना और अपने देश का हित कहीं  नज़र ही नहीं आता है।

विश्व परिदृश्य की इन स्थितियों से जहां एक ओर कुछ राष्ट्र युद्ध की भयावह और विश्व युद्ध की आशंका और परमाणु युद्ध के भय से डरे हुए हैं, आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं,वहीं कुछ राष्ट्र आतंकवाद की मार झेल रहे हैं और कुछ राष्ट्र दोनों में अपना हित देख रहे हैं। युद्ध में संलग्न देश युद्ध को जायज ठहरा रहे हैं वहीं आतंकवाद में संलग्न लोग आतंकवादी घटनाओं को स्वतंत्रता के लिए किये गए प्रयास का समर्थन मानते हैं।हर  देश अपने हिसाब से आतंकवाद और आतंकियों को परिभाषित करने में लगा हुआ है। इसीलिए तो एक देश में आतंकवादी गतिविधियां करने वाले व्यक्तियों को दूसरे देश में आसानी से शरण मिल जाती है, संरक्षण मिल जाता है।

कई बार तो उन्हें बचाने के लिए दूसरे देशों द्वारा नागरिकता तक  दे दी जाती है। उन्हें अपने देश में स्वतंत्रता के नाम पर अनैतिक कार्य करने की अघोषित अनुमति भी प्रदान कर दी जाती है।यह कितना उचित है विचारना होगा? किसी देश द्वारा उसके यहां  आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वाले संगठन और व्यक्तियों को जब अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा आतंकवादी घोषित करवाने के प्रयास किए जाते हैं (ताकि अन्य देशों में ये भविष्य में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम न दे सकें) तो कुछ देश आतंकवादियों को आतंकवादी मानने के लिए ही तैयार नहीं होते, उनके बचाव में आ जाते हैं। उन्हें जितने भी सबूत पीड़ित राष्ट्र द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं, अपर्याप्त ही लगते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करना तो दूर रहा उन्हें संरक्षण ,सुरक्षा, हथियार और धन भी उपलब्ध करवा दिये जाते हैं।आतंकवादियों से निपटने में चीन, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन,रूस, जर्मनी और इजरायल आदि  देशों का अपना नजरिया है,अपना तरीके हैं, अपने नियम हैं। ताकतवर देश तो अपने ऊपर आंच आने पर, आतंकवादी हमला होने पर,आतंकवादियों को दूसरे देशों में बिना पूछे, बिना बताए घुस कर मार देते हैं और उनकी इस कार्यवाही को सही ठहराया जाता है।वहीं दूसरी ओर यदि किसी देश के घोषित आतंकवादी की किसी शरणस्थली बने दूसरे देश में अज्ञात हमलावरों द्वारा अज्ञात कारणों से हत्या कर दी जाती है तो इसके लिए भी उस देश को जिम्मेदार ठहराया जाता है, कटघरे में खड़ा किया जाता है।

यह भी विचार नहीं किया जाता वह किसी राष्ट्र का घोषित आतंकवादी है, उसने मानवता को दंश दिया है। इतना ही नहीं इस घटनाक्रम को अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उलंघन कहा जाता है, संप्रुभता पर हमला माना जाता है। इन राष्ट्रों के इस व्यवहार को कैसे उचित माना जा सकता है? ऐसे रवैये से तो आतंकवाद के समाप्त होने के स्थान पर बढ़ने की संभावना अधिक है।

anti terror conference :

हाल ही में हमास द्वारा इजरायल पर किये हमले को कुछ देश आज भी आतंकवादी घटना मानने को तैयार ही नहीं जबकि इस हमले में सैकड़ों निरपराध नागरिकों की हत्या की गई है। इतना ही नहीं कुछ देश तो इजरायल द्वारा अपराधिक आतंकवादियों के विरुद्ध जवाबी कार्रवाई को  भी सही नहीं ठहरा रहे हैं। ऐसा ही कुछ भारत के साथ भी होता आया है।भारत में विशेषकर काश्मीर में हो रही  आतंकवादी घटनाओं को पाकिस्तान सहित कुछ देश  आतंकवादी घटनाएं मानने को तैयार नहीं है। भारत  के न जाने कितने घोषित आतंकवादी दूसरे देशों में शरण लिए हुए हैं और वहीं से आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। भारत द्वारा आतंकवादी गतिविधियां के प्रमाण देने पर भी  उन्हें कुछ देशों द्वारा आतंकवादी ही नहीं माना जा रहा है, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी की सूची में डालने में रोड़ा अटकाया जाता है।

आतंकवादियों को उनके मूल देश को सौंपा  नहीं जाता है। ऐसा लगता है कुछ देश चाहते ही नहीं है कि विश्व से आतंकवाद  समाप्त हो,  आतंकवादियों को सजा  मिले, और जो पीड़ित हैं और आतंकवादियों के दंश का शिकार हुए हैं उन्हें न्याय मिले ।यह कितना न्याय संगत है, मानवता हितकारी है ? इतना ही नहीं कुछ देश खुलकर आतंकवाद का , आतंकवादी घटनाओं का समर्थन कर रहे हैं, कुछ देश आतंकवाद और आतंकियों को चोरी छुपे तो कुछ  खुलकर समर्थन, सहायता और हथियार पहुंचा रहे  हैं। ऐसे में विश्व से आतंकवाद कैसे समाप्त होगा? बेकसूर लोगों का मरना कैसे रूकेगा?। सभी देशों को समझना चाहिए उनके यहां आज भले ही आतंकवाद की समस्या न हो पर भविष्य में वे इस समस्या का शिकार नहीं हो सकते इसकी गारंटी वे नहीं दे सकते।इतिहास गवाह है पहले जिन देशों में आतंकवाद का नाम और निशाना नहीं था वे भी आतंकी हमलों का शिकार हुए हैं।

अब तो आतंकवादी और उनके हमले हाईटेक हो गये है, टैंक ,मिसाइल, राकेट तक पहुंच गये है। इस आशंका को भी नकारा नहीं जा सकता कि भविष्य में कोई देश इन्हें परमाणु हथियार उपलब्ध करा दे। शक्तिशाली देशों को मानवता की खातिर इन संभावनाओं पर भी विचार कर आतंकवाद को समूल नष्ट करने के लिए पहल करना चाहिए।

अतः विश्व के सभी देशों को शांति की खातिर,मानवता की खातिर, निरपराध लोगों की निर्मम हत्याओं को रोकने के लिए, आतंकवाद से लड़ने में खर्च हो रहे धन को रोटी,कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और विकास हेतु उपलब्ध कराने के लिए-(1) आतंकवादी घटना किसी भी देश में हों, आतंकवादी किसी भी देश का हो, धर्म का हो उसके विनाश के लिए सभी देशों द्वारा मिल कर प्रहार किया जाना चाहिए। विश्व की एक आवाज में आतंकवाद का विरोध होना चाहिए ।

केवल भर्त्सना से काम नहीं चलेगा (2) किसी भी देश द्वारा घोषित आतंकवादी को अपने यहां शरण और नागरिकता नहीं देनी चाहिए (3) आतंकवादियों को सजा मिल सके और जिनकी जाने गई है उन्हें न्याय मिल सके, इसके लिए आतंकवादियों को पकड़ कर तुरंत उस देश को वापिस सौंपना चाहिए, जहां का वो नागरिक हैं और जहां उसने आतंकवादी घटना को अंजाम दिया है। (4) आतंकवादी किसी भी देश का हो उसको फंडिंग और हथियारों की सप्लाई कतई नहीं की जाना चाहिए।(5) सभी देशों में आतंकवादी संगठनों के खाते सीज होना चाहिए (6) किसी भी देश को उसके यहां दूसरे देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता के विरुद्ध किसी भी प्रकार की गतिविधियों को संचालित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। (7) देश और विदेश में जहां भी आतंकवादी पकड़े जाते हैं उन्हें तुरंत सजा हो सके, ऐसे प्रयास होना चाहिए।

anti terror conference : आतंकवाद की समस्या का निरंतर विस्तार हो रहा है। वह नये नये रूप में नये देशों में अपने पांव पसार रहा है। नवयुवकों को कभी लालच देकर, कभी बरगला कर, कभी धमका कर आतंकवाद की आग में  ढकेला जा रहा है।अतः विश्व शांति और निरपराध लोगों की , जवानों की हत्याओं को रोकने के लिए आतंकवाद पर सब देशों को एक मत हो जाना चाहिए। ऐसा करके सभी शांति स्थापना के साथ ना जाने कितनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, मानव जीवन को खुशहाल बना सकते हैं।

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